खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोविन्द सिंह जी का बलिदान कब हुआ ? Guru Govind Singh ji the founder of khalsha panth,was martyred??

 


पौष माह की सप्तमी तिथि पर सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती मनाई जाती है। इस साल 6 जनवरी को गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती मनाई जा रही है। गुरु गोविंद सिंह जी सिक्ख धर्म के दसवें और आखिरी गुरु थे। वे सिख धर्म के 9वें गुरु तेगबहादुर के पुत्र थे। सिख धर्म में गुरु गोबिंद सिंह का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने सिक्ख धर्म के लिए कई नियम बनाए, जिसका पालन आज भी किया जाता है। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु के रूप में स्थापित किया किया और सामाजिक समानता का पुरजोर समर्थन किया। गुरु गोविंद सिंह जी अपने जीवनकाल में हमेशा दमन और भेदभाव के खिलाफ खड़े रहे, गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन के बारे में खास बातें.

नानकशाही कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक वर्ष पौष माह की सप्तमी तिथि को ही गुरु गोविन्दसिंह की जयन्ती मनायी जाती है। वहीं अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 22 दिसंबर 1666 में गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ था। नानकशाही कैलेंडर को देखते हुए पौष सप्तमी पर ही इनकी जयंती मनाई जाती है।इसीलिए हर वर्ष अंग्रेजी कलेण्डर मे गुरु गोविन्दसिंह जी की तिथि बदलती रहती है। 

शौर्य और साहस के प्रतीक गुरु गोविन्द सिंह जी सिख धर्म के दसवें गुरु थे। इन्होंने ही बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। 

गुरु गोविन्द सिंह जी ने ही खालसा वाणी, 'वाहे गुरु की खालसा, वाहेगुरु की फतेह' दिया था। खालसा पंथ की स्थापना के पीछे इनका उद्देश्य धर्म की रक्षा करना और मुगलों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाना था।

कहा जाता है कि सिखों के लिए पांच चीजें- बाल, कड़ा, कच्छा, कृपाण और कंघा धारण करने का आदेश गुरु गोविन्द सिंह जी ने ही दिया था। इन चीजों को 'पांच ककार' कहा जाता है, जिन्हें धारण करना सभी सिखों के लिए अनिवार्य होता है।

कहा जाता है कि गुरु गोविन्द सिंह एक महान योद्धा होने के साथ कई भाषाओं के जानकार और विद्वान महापुरुष थे। इन्हें पंजाबी, फारसी, अरबी, संस्कृत और उर्दू समेत कई भाषाओं की अच्छी जानकारी थी। 

सिक्ख धर्म में कुल 10 गुरु हुए। गुरु गोविन्द सिंह जी सिखों के दसवें  और आखिरी गुरु थे। इनके बाद ही गुरु ग्रंथ साहिब को सर्वोच्च गुरु का दर्जा दिया गया था। 

कहा जाता है कि अपने पिता गुरु तेग बहादुर की शहादत के बाद मात्र 9 साल की उम्र में ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु की जिम्मेदारी ली। 

उन्होंने छोटी सी उम्र में ही धनुष- बाण, तलवार, भाला आदि चलाने की कला भी सीखी और फिर अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा में गुजार दिया। खालसा पंथ के माध्यम से उन्होंने राजनीतिक एवं सामाजिक विचारों को आकार दिया गुरु गोविंद सिंह जी की लड़ाइयां सिद्धांत एवं आदर्शों की लड़ाइयां थी और इन आदर्शों के धर्म युद्ध में जूझ करने एवं लक्ष्य प्राप्त हेतु हुए ईश्वर से वर मांगते हैं। दे देहि शिवा वर मोही, इहैं शुभ करमन ते कबहू न टरौं

 


पौष माह की सप्तमी तिथि पर सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती मनाई जाती है। इस साल 6 जनवरी को गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती मनाई जा रही है। गुरु गोविंद सिंह जी सिक्ख धर्म के दसवें और आखिरी गुरु थे। वे सिख धर्म के 9वें गुरु तेगबहादुर के पुत्र थे। सिख धर्म में गुरु गोबिंद सिंह का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने सिक्ख धर्म के लिए कई नियम बनाए, जिसका पालन आज भी किया जाता है। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु के रूप में स्थापित किया किया और सामाजिक समानता का पुरजोर समर्थन किया। गुरु गोविंद सिंह जी अपने जीवनकाल में हमेशा दमन और भेदभाव के खिलाफ खड़े रहे, गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन के बारे में खास बातें.

नानकशाही कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक वर्ष पौष माह की सप्तमी तिथि को ही गुरु गोविन्दसिंह की जयन्ती मनायी जाती है। वहीं अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 22 दिसंबर 1666 में गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ था। नानकशाही कैलेंडर को देखते हुए पौष सप्तमी पर ही इनकी जयंती मनाई जाती है।इसीलिए हर वर्ष अंग्रेजी कलेण्डर मे गुरु गोविन्दसिंह जी की तिथि बदलती रहती है। 

शौर्य और साहस के प्रतीक गुरु गोविन्द सिंह जी सिख धर्म के दसवें गुरु थे। इन्होंने ही बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। 

गुरु गोविन्द सिंह जी ने ही खालसा वाणी, 'वाहे गुरु की खालसा, वाहेगुरु की फतेह' दिया था। खालसा पंथ की स्थापना के पीछे इनका उद्देश्य धर्म की रक्षा करना और मुगलों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाना था।

कहा जाता है कि सिखों के लिए पांच चीजें- बाल, कड़ा, कच्छा, कृपाण और कंघा धारण करने का आदेश गुरु गोविन्द सिंह जी ने ही दिया था। इन चीजों को 'पांच ककार' कहा जाता है, जिन्हें धारण करना सभी सिखों के लिए अनिवार्य होता है।

कहा जाता है कि गुरु गोविन्द सिंह एक महान योद्धा होने के साथ कई भाषाओं के जानकार और विद्वान महापुरुष थे। इन्हें पंजाबी, फारसी, अरबी, संस्कृत और उर्दू समेत कई भाषाओं की अच्छी जानकारी थी। 

सिक्ख धर्म में कुल 10 गुरु हुए। गुरु गोविन्द सिंह जी सिखों के दसवें  और आखिरी गुरु थे। इनके बाद ही गुरु ग्रंथ साहिब को सर्वोच्च गुरु का दर्जा दिया गया था। 

कहा जाता है कि अपने पिता गुरु तेग बहादुर की शहादत के बाद मात्र 9 साल की उम्र में ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु की जिम्मेदारी ली। 

उन्होंने छोटी सी उम्र में ही धनुष- बाण, तलवार, भाला आदि चलाने की कला भी सीखी और फिर अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा में गुजार दिया। खालसा पंथ के माध्यम से उन्होंने राजनीतिक एवं सामाजिक विचारों को आकार दिया गुरु गोविंद सिंह जी की लड़ाइयां सिद्धांत एवं आदर्शों की लड़ाइयां थी और इन आदर्शों के धर्म युद्ध में जूझ करने एवं लक्ष्य प्राप्त हेतु हुए ईश्वर से वर मांगते हैं। दे देहि शिवा वर मोही, इहैं शुभ करमन ते कबहू न टरौं

गुरु गोबिंद सिंह को सरहद के नवाब वजीर खां ने दो पठानों के जरिए धोखे से मारा था। 

गुरु गोबिंद सिंह का निधन 7 अक्टूबर, 1708 को महाराष्ट्र के नांदेड़ में हुआ था, 

वजीर खांने अपने दो सिपाहियों को गुरु गोबिंद सिंह पर हमला करने का आदेश दिया था,

इन पठानों ने गुरु गोबिंद सिंह पर घातक वार किया था।


गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें गुरु थे, 

गुरु गोबिंद सिंह एक संत, लीडर, और योद्धा थे। 

गुरु गोबिंद सिंह ने अपने बेटों को भी शस्त्र शिक्षा का ज्ञान दिया था, 

गुरु गोबिंद सिंह ने औरंगजेब को जफरनामा लिखा था और उसे शांति वार्ता के लिए आमंत्रित किया था।


महान संत, सिखों के दशम गुरु एवं खालसा पंथ के संस्थापक गुरु श्री गोबिन्द सिंह जी महाराज के पावन प्रकाश पर्व पर उन्हें कोटि-कोटि नमन!


धर्म और मानवता की रक्षा के लिए समर्पित उनका पराक्रमी जीवन हम सभी को सत्य, सेवा और त्याग के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है।

महान संत, सिखों के दशम गुरु एवं खालसा पंथ के संस्थापक गुरु श्री गोबिन्द सिंह जी महाराज के पावन प्रकाश पर्व पर उन्हें कोटि-कोटि नमन,


धर्म और मानवता की रक्षा के लिए समर्पित उनका पराक्रमी जीवन हम सभी को सत्य, सेवा और त्याग के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है।

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